
संसार के सभी व्यक्ति सुख एवं शान्ति चाहते हैं तथा विश्व में जो कुछ भी व्यक्ति कर रहा है, उसका एक ही मुख्य लक्ष्य है कि इससे उसे सुख मिलेगा। व्यक्ति ही नहीं, कोई भी राष्ट्र अथवा विश्व के सम्पूर्ण राष्ट्र मिलकर भी इस बात पर सहमत हैं कि विश्व में शान्ति स्थापित होनी चाहिए। प्रतिवर्ष इसी उद्देश्य से ही एक व्यक्ति को, जो कि सर्वात्मना शांति स्थापित करने के लिए समर्पित होता है, उसको नोबेल पुरस्कार भी प्रदान किया जाता है। परन्तु यह शान्ति कैसे स्थापित हो, इस बात को लेकर सभी असमंजस की स्थिति में हैं।
सभी लोग अपने-अपने विवेक के अनुसार इसके लिए कुछ चिन्तन करते हैं, परन्तु एक सर्वसम्मत मार्ग नहीं निकल पाता। इसका अर्थ है कि दुनिया के लोग जिन उपायों पर विचार कर रहे हैं, उनमें सार्थकता तो है, परन्तु परिपूर्णता, समग्रता एवं व्यापकता नहीं। प्रचलित मत पन्थों, सप्रदायों एवं तथाकथित धर्मों को अपनाने से जहाँ व्यक्ति को एक ओर थोड़ी शान्ति मिलती है, वहीं इन संप्रदायों के पचड़े में पड़कर व्यक्ति कुछ ऐसे झूठ अन्धविश्वासों, कुरीतियों एवं मिथ्या आग्रहों में फँस जाता है। जिनसे निकलना मुश्किल हो जाता है। साथ ही वह पूर्ण सत्य से भी वंचित रह जाता है। परन्तु क्या ऐसा कुछ नहीं हो सकता, जिस पर दुनिया के हर इन्सान चल सकें? क्या ऐसे कुछ नियम, सिद्धान्त, मान्यताएँ एवं मर्यादाएँ हो सकती हैं, जिनपर पूरी दुनिया के सभी व्यक्ति चल सकें? जिससे किसी भी व्यक्ति एवं राष्ट्र की एकता एवं अखण्डता नहीं होती हो और न ही किसी का व्यक्तिगत स्वार्थ सिद्ध होता हो, जिसको प्रत्येक व्यक्ति अपना सकता हो और जीवन में पूर्ण सुख, शान्ति एवं आनन्द को प्राप्त कर सकता है।
यह है- महर्षि पतंजलि-प्रतिपादित अष्टांग योग का पथ। यह कोई मत-पन्थ या सप्रदाय नहीं, अपितु जीवन जीने की सम्पूर्ण पद्धति है। यदि संसार के लोग वास्तव में इस बात को लेकर गम्भीर हैं कि विश्व में शांति स्थापित होनी ही चाहिए तो इसका एकमात्र समाधान है अष्टांग योग का पालन। अष्टांग योग के द्वारा ही वैयक्तिक एवं सामाजिक समरसता, शारीरिक स्वास्थ्य, बौद्धिक जागरण, मानसिक शान्ति एवं आत्मिक आनन्द की अनुभूति हो सकती है। अब हम संक्षेप में इस अष्टांग योग के सम्बन्ध में विचार करते हैं। महर्षि पतंजलि योगसूत्रों के माध्यम से लिखते हैंः
यमनियमासनप्राणायामप्रत्याहारधारणाध्यानसमाधयोsष्टावङ्गानि।। (योगसूत्र- 2.29)
- यम, 2. नियम, 3. आसन, 4. प्राणायाम, 5. प्रत्याहार, 6. धारणा, 7. ध्यान तथा 8. समाधि- ये योग के आठ अंग हैं। इन सब योगांगों का पालन किये बिना कोई भी व्यक्ति योगी नहीं हो सकता। यह अष्टांग योग केवल योगियों के लिए ही नहीं, अपितु जो भी व्यक्ति जीवन में स्वयं पूर्ण सुखी होना चाहता है तथा प्राणिमात्र को सुखी देखना चाहता है, उन सबके लिए अष्टांग योग का पालन अनिवार्य है। अष्टांग योग धर्म, अध्यात्म, मानवता एवं विज्ञान की प्रत्येक कसौटी पर खरा उतरता है। इस दुनिया के आपसी संघर्ष को यदि किसी उपाय से रोका जा सकता है तो वह अष्टांग योग ही है। अष्टांग योग में जीवन के सामान्य व्यवहार से लेकर ध्यान एवं समाधि-सहित अध्यात्म की उच्चतम अवस्थाओं तक का अनुपम समावेश है। जो भी व्यक्ति अपने अस्तित्व की खोज में लगा है तथा जीवन के पूर्ण सत्य को परिचित होना चाहता है, उसे अष्टांग योग का अवश्य ही पालन करना चाहिए। यम और नियम अष्टांग योग के मूल आधार हैं।
- यम
अष्टांग योग का प्रथम अंग है यम। यम शब्द ‘यमु उपरमे’ धातु से निष्पन्न होता है, जिसका अर्थ है – यम्यन्ते उपरम्यन्ते निवर्त्यन्ते हिंसादिभ्य इन्द्रियाणि यैस्ते यमाः ‘अर्थात् जिनके अनुष्ठान से इन्द्रियों एवं मन को हिंसादि अशुभ भावों से हटाकर आत्मकेन्द्रित किया जाये, वे यम हैं’। महर्षि पतंजलि ने इन यमों की परिगणना इस प्रकार की हैः
अहिंसासत्यास्तेयब्रह्मचर्यापरिग्रहाः यमाः।। (योगसूत्र- 2.30)
अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य तथा अपरिग्रह-ये पाँच यम हैं। अब हम यहाँ क्रमश इनका संक्षेप में वर्णन करते हैं।
(क) अहिंसा- अहिंसा का अर्थ है किसी प्राणी को मन, वचन तथा कर्म से कष्ट न देना। मन में भी किसी का अहित न सोचना, किसी को कटुवाणी आदि के द्वारा भी कष्ट न देना तथा कर्म से भी किसी भी अवस्था में, किसी भी स्थान पर ‘किसी भी दिन’ किसी भी प्राणी की हिंसा न करना, अपितु प्राणिमात्र से आत्मबल प्रेम तथा सम्पूर्ण सृष्टि के प्रति मैत्री एवं करुणा की दृष्टि रखना यही यथार्थ रूप में अहिंसा है। महर्षि व्यास भी कहते हैं-
तत्राहिंसा सर्वथा सर्वदा सर्वभूतानामनभिद्रोह। (योगसूत्र-व्यासभाष्य- 2.30)
(ख) सत्य- जैसा देखा, सुना तथा जाना हो, वैसा ही शुद्ध भाव मन में हो, वही प्राणी में तथा उसी के अनुरूप कार्य हो तो वह सत्य कहलाता है। दूसरों के प्रति ऐसी वाणी कभी नहीं बोलनी चाहिए, जिसमें छल-कपट हो, भ्रान्ति पैदा होती हो अथवा जिसका कोई प्रयोजन न हो। ऐसी वाणी बोलनी चाहिए जिससे किसी प्राणी को दुःख न पहुँचे। वाणी सर्वभूतहिताय होनी चाहिए। दूसरों की हानि करने वाली वाणी पापमयी होने से दुःखजनक होती है। अत परीक्षा करके सब प्राणियों का हित करने वाली वाणी का ही प्रयोग करना चाहिए। यही बात महर्षि व्यास सत्य के सम्बन्ध में कहते हैं ‘सत्यं यथार्थे वाङ्मनसी। यथादृष्टं यथानुमितं यथाश्रुतं तथा वाङ्मनश्चेति। परत्र स्वबोधसंक्रान्तये वागुक्ता सा यदि न बाधिता भ्रान्ता वा प्रतिपत्तिबन्ध्या वा भवेदिति। एषा सर्वभूतोपकारार्थं प्रवृत्ता न भूतोपघाताय’।
(योगसूत्र-व्यासभाष्य- 2.30)
(ग) अस्तेय- अस्तेय का अर्थ है चोरी न करना। दूसरों की वस्तु पर बिना पूछे अधिकार करना अथवा शास्त्रविरुद्ध ढंग से वस्तुओं का ग्रहण करना स्तेय (चोरी) कहलाता है। दूसरों की वस्तु को प्राप्त करने की मन में लालसा भी चोरी है। अत योगी पुरुष को न तो चोरी करनी चाहिए, न ही किसी से करवानी चाहिए, अपितु अपने सात्विक व पूर्ण पुरुषार्थ से तथा भगवान् की कर्मफल व्यवस्था के अनुरूप या प्रकृति के विधान से जो कुछ हमें प्राप्त होता है उसमें पूर्ण सन्तुष्ट एवं आनन्दित रहना चाहिए।
यही मेरे जीवन का स्वधर्म है। ऐसा कहते हुए यदि मुझे मरना भी पड़े तो मुझे ‘स्वधर्मे निधनं श्रेय’ स्वीकार है।
ये वितर्क क्या हैं? तथा इनसे बचने की प्रतिपक्ष-भावना क्या है? इसके सम्बन्ध में महर्षि पतंजलि कहते हैं-
वितर्का हिंसादय कृतकारितानुमोदिता लोभक्रोधमोहपूर्वका
मृदुमध्याधिमात्रा दुःखाज्ञानानन्तफला इति प्रतिपक्षभावनम्। (योगसूत्र- 2.34)
ये हिंसा, असत्य, चोरी सत्य आदि वितर्क (कृत्य- अर्थात् स्वयं किये हुए, कारित-दूसरों के द्वारा कराये गये और अनुमोदित-अनुमोदन (समर्थन) किये गये) लोभ, क्रोध और अज्ञान के कारण उत्पन्न होने वाले हैं। ये मृदु, मध्य और तीव्र भेदवाले तथा अनन्त-असीम दुःख और अज्ञान रूप फल देनेवाले हैं। यह विचार ही प्रतिपक्ष भावना या चिन्तन है। इन हिंसा एवं असत्यादि वितर्कों (बाधाओं) में से हम उदाहरणार्थ हिंसा को लेते हैं।
हिंसा के प्रकार, जिनसे साधकों को बचना चाहिए
यह हिंसा तीन प्रकार की होती है। प्रथम कृत- स्वयं अपने मन, वचन तथा कर्म से किसी की हिंसा करना; द्वितीय कारित- स्वयं प्रत्यक्ष रूप से तो किसी की हिंसा नहीं करना, परन्तु दूसरों से करवाना, तथा तृतीय अनुमोदित- हिंसा के लिए दूसरों को प्रेरित करना या दूसरों द्वारा की गई हिंसा का अनुमोदन करना। तीन प्रकार की हिंसाओं के लोभ, क्रोध और मोहपूर्वक होने से पुन तीन-तीन भेद हैं। मांस, चमड़ा, भूमि, भवन तथा अन्य किसी लोभ के लिए कृत, कारित तथा अनुमोदित लोभजन्य हिंसा है। इसी प्रकार क्रोधजन्य हिंसा (कृत, कारित तथा अनुमोदित तीनों प्रकार की) इसलिए करना कि इस हिंसित होनेवाले प्राणी ने मेरा कोई अनिष्ट किया है। मोह के कारण कृत, कारित तथा अनुमोदित हिंसा इसलिए की जाती है कि मेरी स्त्राr, पुत्र अथवा किसी प्रियजन का स्वार्थ सिद्ध होने से मेरा स्वार्थ सिद्ध हो जायेगा।
लोभ, क्रोध एवं मोहपूर्वक की गई हिंसा के पुन प्रत्येक के तीन-तीन भेद किये गये हैं-मृदु, मध्य एवं अधिमात्र। लोभ, क्रोध, मोह की मात्रा कम होने से मृदु हिंसा (हिंसा कम मात्रा में), इनकी मात्रा मध्य स्तर एवं अधिक स्तर होने से हिंसा भी मध्यस्तर एवं अधिमात्र स्तर की होती है। इन मृदु, मध्य, अधिमात्र की हिंसा में भी प्रत्येक के पुन तीन-तीन भेद किये गये हैं। यथा मृदु स्तर की हिंसा के तीन भेद हैं- (1) मृदु-मृदु- मृदुस्तर की हिंसा में सबसे कम हिंसा का होना; (2) मध्य मृदु- मृदु हिंसा से कुछ अधिक हिंसा होना; (3) तीव्र मृदु- मृदु स्तर की ही सीमा में सबसे अधिक हिंसा का होना। इसी तरह से ‘मध्यस्तर’ एवं ‘अधिमात्रस्तर’ हिंसा के भी तीन-तीन भेद होते हैं। इस प्रकार हिंसा 81 प्रकार की होती है। यह 81 भेदों वाली हिंसा नियम, विकल्प और समुच्चय-भेद से असंख्य भेदों वाली हो जाती है।
इसी प्रकार हिंसा की तरह ही असत्य आदि अन्य वितर्कों के भी 81-81 प्रकार समझने चाहिए। असत्य, चोरी, अब्रह्मचर्य, ब्रह्मचर्य तथा परिग्रह भी स्वयं करना, दूसरों से करवाना तथा कोई अन्य कर रहा हो तो उसका अनुमोदन करना भी साधक के लिए बाधक है। स्वयं झूठ न बोलकर दूसरों से बुलवाना तथा झूठे व्यक्तियों का अनुमोदन करना भी असत्य ही है। इसी प्रकार चोरी करना, दूसरों से करवाना तथा अनुमोदन करना सब चोरी के अन्तर्गत ही है। स्वयं तो ब्रह्मचर्य का पालन न करना, परन्तु दूसरों को ब्रह्मचर्य-पालन करवाना तथा ब्रह्मचर्य के लिए प्रेरित करना भी पूर्ण ब्रह्मचर्य नहीं हो सकता। इसी प्रकार अपरिग्रह के विषय में जानना चाहिए।
कृत-कारित-अनुमोदित की तरह ही असत्य-चोरी आदि के अन्य लोभ-क्रोध-मोहपूर्वक आदि भेद हिंसा की तरह ही समझने चाहिए और साधक को अपने मन में यह दृढ़ संकल्प धारण करना चाहिए कि ये वितर्क निश्चय ही दुःख-रूप तथा अज्ञान-रूप अनन्त अशुभ फलों के देने वाले हैं। इस प्रकार प्रतिपक्ष-वितर्क एवं विरोधी भावना बनाकर हिंसा, असत्य आदि से बचकर निरन्तर योगानुष्ठान करते हुए आत्मसाक्षात्कार के मार्ग पर निरन्तर आगे बढ़ना चाहिए।
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